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Friday, August 14, 2020

10 सबसे ज्यादा प्रोटीन युक्त घटक

August 14, 2020 0

 प्रोटीन शरीर को निर्माण करने वाले सबसे महत्वपूर्ण तत्वों में से एक है। एक स्वस्थ मानव शरीर में लगभग 62% पानी 16% प्रोटीन 6% खनिज और 1% से कम कार्बोहाइड्रेट थोड़ी मात्रा में विटामिन और कुछ अन्य पदार्थ होते हैं।

10 सबसे ज्यादा प्रोटीन युक्त घटक


10 सबसे ज्यादा प्रोटीन युक्त घटक

 प्रोटीन हमारे शरीर में बालों मांसपेशियों त्वचा हड्डियों नाखूनों और रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है रूटीन शरीर की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। साथ ही शरीर के संतुलन को बनाए रखने के लिए जरूरी है। प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा हमारे बेहतर स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है।

यह जानिए- बुखार क्या है और हमें क्यों आता है?

 ऐसे में अक्सर लोग मानते हैं। कि प्रोटीन के लिए 'अंडा' सबसे बेहतर जरिया है। लेकिन आप भी जानिए कि कुछ फूड के बारे में जिन में सबसे ज्यादा प्रोटीन होता है।आज हम जानेंगे कि सबसे ज्यादा प्रोटीन किसमें होता है।


1) सोयाबीन 

सोयाबीन मीट (मास) और अंडे से भी ज्यादा प्रोटीन युक्त आहार है। प्रोटीन के अलावा सोयाबीन विटामिन बी कंपलेक्स विटामिन और खनिज पदार्थों से भी भरपूर होता है। इसके अलावा सोयाबीन फाइबर से भी भरपूर होता है। तो 100 ग्राम सोया चंक्स में करीब 50 ग्राम प्रोटीन होता है।


2) पनीर

पनीर दूध से बने सभी प्रोडक्ट स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी होते हैं। जो कि हमारे शरीर में कैल्शियम की कमी को पूरा करते हैं। पनीर भी दूध से ही तैयार होता है। और इसमें प्रोटीन साथ और फैट पाया जाता है। 100 ग्राम पनीर में 18 ग्राम के आसपास प्रोटीन होता है।


 3) मूंग की दाल

मूंग की दाल प्रोटीन की कमी पूरी करने का एक बहुत ही सस्ता साधन है। क्योंकि मूंग की दाल प्रोटीन से भरपूर होती है सिर्फ 100 ग्राम मूंग की दाल में करीब 24 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है।


 4) बादाम 

बादम बेहतरीन किस्म के फ्लैट के साथ भरपूर प्रोटीन से युक्त होता है। 100 ग्राम बादाम में लगभग 21 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है।


5) काजू 

काजू यूं तो काजू के कई फायदे हैं। और यह वजन बढ़ाने के लिए भी सहायक है। साथ ही यह प्रोटीन से भरपूर होता है। सिर्फ 100 ग्राम काजू में करीब 553 कैलरी 44 ग्राम सोंठ और करीब 18 ग्राम प्रोटीन होता है।


 6) दूध 

दूध सिर्फ शरीर में कैल्शियम की कमी को पूरा करके हड्डियों को मजबूत करता है। बल्कि यह प्रोटीन से भी भरपूर होता है। 1 लीटर दूध में करीब 40 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है। 


7) अंकुरित अनाज 

अंकुरित अनाज भी प्रोटीन सेवन का एक बेहतरीन जरिया है। एक कप अंकुरित अनाज में करीब 15 ग्राम प्रोटीन होता है।


 8) मूंगफली 

यूं तो मूंगफली में फैट पाया जाता है। लेकिन यह प्रोटीन से भरपूर होती है। सिर्फ 100 ग्राम मूंगफली में करीब 26 ग्राम प्रोटीन होता है।


9) चना 

चना नासिर प्रोटीन बल्कि फाइबर से भी भरपूर होता है। इसे भिगोकर उबालकर या फ्राई करके भी खा सकते हैं। 100 ग्राम चने में करीब 15 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है। 


10) दही 

दूध से बनी हर चीज में भरपूर प्रोटीन पाया जाता है। और इसीलिए दही भी प्रोटीन का एक बेहतर जरिया है। 100 ग्राम दही में करीब 11 ग्राम प्रोटीन होता है।


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 लेकिन हां बिना सोचे ज्यादा प्रोटीन के सेवन से नुकसान हो सकता है उस प्रोटीन का कितना सेवन करना चाहिए या आपकी उम्र आपका वजन और दिनचर्या पर निर्भर करता है। सही मात्रा में प्रोटीन के सेवन से जुड़ी जानकारी आप अपने चिकित्सक से ले इसी के साथ यह जानकारी आपको कैसी लगी हमें लिख करके जरूर बताइए... धन्यवाद

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Wednesday, August 12, 2020

बगल में पसीना और बदबू पसीने की बदबू रोकने के घरेलू उपाय

August 12, 2020 0
बगल में पसीना और बदबू पसीने की बदबू रोकने के घरेलू उपाय

गर्मियों के दिनों में सबसे ज्यादा आता है पसीना पसीना आना कोई समस्या नहीं है। लेकिन पसीने से आने वाली बदबू दूसरे लोगों को काफी ज्यादा परेशान करती है। दोस्तों अब इस पसीने की बदबू को दूर करने के लिए।

पसीना और बदबू पसीने की बदबू रोकने के घरेलू उपाय

 मार्केट में तरह-तरह के न्यूज़ वगैरह आते रहते हैं। जो कि आपको बदबू से निजात जरूर दिलाते हैं लेकिन केवल 1 या 2 घंटे तक और 2 घंटे बाद पहले से भी ज्यादा बदबू आने लगती है। लेकिन दोस्तों यहां पर ध्यान इस बात का दिया जाता है कि किसी इंसान को अगर स्किन एलर्जी है तो ऐसे में यह जियो और इस पे का प्रयोग करने से कई सारी प्रॉब्लम का भी सामना करना पड़ सकता है दोस्तों कुछ ऐसे घरेलू नुस्खे आज की इस आर्टिकल में हम आपको बताने वाले हैं जो कि बिल्कुल आसान है। इस का उपयोग करके आप पूरी तरह से नेचुरल ही शरीर से आने वाली बदबू को दूर कर सकते हैं।

 और इससे आपको कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होगा तो आज की इस आर्टिकल में उसी की जानकारी हम आपके लिए लेकर आए हैं तो चलिए जानते ऐसे कौन कौन से घरेलू तरीके हैं जिसके जरिए पसीने से आने वाली बदबू से हम आसानी से निजात पा सकते हैं। 

मुल्तानी मिट्टी

 मुल्तानी मिट्टी से जी हां आप चाहे तो मुल्तानी मिट्टी को अपने बगल में और पैरों में रगड़ने और इसे सूखने दें जब यह पूरी तरह से सूख जाए तो इसे धो लें ऐसा करने से डेड स्किन या पुराना पसीना जो इसकी शरीर में फैल रहा है वह सुप्रभा निकल जाता है।

-: क्या आप यह जानते हैं मुंह से बदबू क्यों आती है?

हैंड सेनीटाइजर

 हैंड सेनीटाइजर जी हां अगर आप बहुत भीड़ वाली जगह पर है और शरीर से आने वाली पसीने की बदबू से छुटकारा पाना चाहते हैं तो इसके लिए हैंड सैनिटाइजर का प्रयोग कर सकते हैं दोस्तों इसके लिए आपको हैंड सैनिटाइजर की कुछ मात्रा हाथों में लगानी है और इसे अपने बगल में रगड़ना यह बगल में पसीने से बदबू पैदा करने वाले व्यक्तियों से लड़ेगा जिससे बगल से पसीने की बदबू नहीं आयेगी बात करते हैं अगले नुसखे की जो कि है 


फिटकरी

फिटकरी दोस्तों फिटकरी एक एंटीसेप्टिक है जो पसीने से आने वाली दुर्गंध को नष्ट कर दी है इसलिए नहाने के पानी में अगर आप एक चुटकी फिटकरी का पाउडर मिलाकर नहाते हैं तो इससे बॉडी से कम से कम पसीना निकलता है और पसीने से स्मेल भी नहीं आती है इसलिए नहाने के पानी में फिटकरी डालकर नहाते समय आपको इस बात का ध्यान रखना है कि फिटकरी की मात्रा आप ज्यादा ना डालें जी हां नहीं तो इससे स्किन में ड्राइनेस आ सकती है मतलब हल्की सी मात्रा ही आपको डालनी है ताकि कोई स्किन प्रॉब्लम आपको ना हो दोस्तो बात करते हैं अगले तरीके की जोकि 


बेड टीशु

बेड टीशु का प्रयोग करना जी हां बहुत ज्यादा पसीना अगर आता है और आप इसकी दुर्गन्ध से बचे रहना चाहते हैं तो तेल सोक्ता पेपर ले बेटा पसीना पोंछ लें या पेपर नमी को सोखने में कारगर होते हैं इसलिए अपनी बगल में इसे रगड़ना चाहिए जिसे पसीने से आने वाली दुर्गंध को रोका जा सके बात करते हैं अगले तरीके की जो कि है 


व्हीटग्रास

व्हीटग्रास का जूस पीना जी हां व्हीटग्रास यानी कि गेहूं के ज्वारे में को रोकना था मात्रा में पाया जाता है जिससे शरीर के जहरीले पदार्थ बाहर निकल जाते हैं इसलिए पसीने की बदबू से छुटकारा पाने के लिए रोजाना व्हीटग्रास का जूस पी सकते हैं थोड़ी मात्रा में बात करते हैं अगले तरीके की दोस्तों 


हल्का सा निंबू का रस

नहाने के पानी में हल्का सा निंबू का रस मिला ना जी हां हर दिन आप स्नान करने जाएं तो पानी में नींबू का रस आप मिक्स कर सकते हैं नींबू पानी से नहाने से आपका सारा दिन खुद को फ्रेशमिल करेगा और इससे बॉडी से आने वाली स्मेल भी दूर होगी अगर स्किन प्रॉब्लम से आप भूल रहे हैं तो नींबू काटकर उसे अंडर आर्म्स पर रगड़ भी सकते हैं या बेहतरीन डीओ की तरह वर्क करता है लेकिन यहां पर भी एक बात खास तौर पर ध्यान रखना दोस्तों बहुत से ऐसे व्यक्ति होते हैं जिसे नींबू से स्किन एलर्जी होती है तो आपको क्या करना है 


केवल 1 दिन हल्की मात्रा में नींबू मिलाकर स्नान करना है और उसके बाद दो या तीन दिन तक इसके प्रभाव को अपने शरीर पर देखना है अगर आपको कोई प्रॉब्लम नहीं होती है तो आप इसको आजमाएं और अगर आपको कोई प्रॉब्लम है तो इस उपाय को आप ना आजमाए हमने।


 जो पहले उपाय बताएं उसमें से आप किसी उपाय को आजमा सकते हैं तो दोस्तों यह थे वह सारे घरेलू तरीके जो मैं पसीने की बदबू से छुटकारा दिला सकते हैं वह भी आसानी से तो दोस्तों यही थी मेरी आज की जानकारी आप लोगों के लिए।


 उम्मीद करता हूं यह आर्टिकल और जानकारी आपको पसंद आई होगी अगर यह जानकारी अच्छी लगती है। इसे शेयर करें।         धन्यवाद....

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Sunday, August 2, 2020

टेस्ट ट्यूब बेबी IVF ट्रीटमेंट

August 02, 2020 0
IVF

टेस्ट ट्यूब बेबी?

लुइस ब्राउन जो अभी करीब 41 साल की है। लेकिन 25 जुलाई 1978 को जब इनका जन्म हुआ था तभी यह काफी चर्चा में आ गई थी। For the first time in history, a human being conceived in a laboratory has been delivered successfully। सोचने वाली बात यह है, कि यह है नॉर्मल सी दिखने वाली बच्ची, खबरों में क्यों आ रही थी क्योंकि यह दुनिया का सबसे पहला टेस्ट ट्यूब बेबी था। 

टेस्ट ट्यूब बेबी? नहीं नहीं, टेस्ट ट्यूब बेबी, टेस्ट ट्यूब में पैदा नहीं होता। तो फिर यह 

टेस्ट ट्यूब बेबी होता कैसे है? 

आपको पता है भारत में, 2.5 करोड़ से भी ज्यादा ऐसे कपल है, जो बच्चा पैदा नहीं कर पाते और दुनिया में हर 8 कप्ल में से 1 को बच्चा पैदा करने में दिक्कत आती है। और समय के साथ-साथ कपल्स में होने वाली इस दिक्कत की वजह से काफी सारे लोग ऐसे हैं जो टेस्ट ट्यूब बेबी करने का कोशिश कर रहे हैं। टेस्ट ट्यूब बेबी मतलब यह कोई अलग तरीके का बच्चा है? 

टेस्ट ट्यूब बेबी इंसान का ही बच्चा है ना?

 टेस्ट ट्यूब बेबी, वह बेबी है, जो IVF द्वारा पैदा होता है। अब IVF क्या है? IVF यानी In Vitro Fertilization जिसमें एक पुरुष के शुक्राणु, और स्त्री के अंडे को एक लैब में, एक पेट्री डिश के अंदर मिलाया जाता है 'In Vitro' का मतलब होता है शरीर से बाहर तो कोई भी प्रोसेस जो शरीर के अंदर ना होकर बाहर होता है, जैसे कि किसी लैब में उसे 'In Vitro' कहते हैं। आपको पता ही होगा कि एक नॉरमल प्रेगनेंसी में मेल स्पर्म फीमेल शरीर के अंदर जाकर उसके अंडे से मिलकर, एक सिंगल एक लौता सेल बनाता है। 

जिसे हम zygote कहते हैं और फिर यह zygote डिवाइड हो हो कर एक एंब्रियो बन जाता है और आखिर में, इसी तरीके से यह एंब्रियो भी, बढ़ते बढ़ते एक बच्चे का रूप ले लेता है। लेकिन IVF में पुरुष शुक्राणु और फीमेल अंडे का मिलन फीमेल के शरीर के अंदर नहीं बल्कि एक पेट्री डिश में किसी लैब में किया जाता है और फिर करीब 3 से 5 दिन बाद, जब यह सिंगल सेल या zygote एक एंब्रियों का रूप ले लेता है तो इसको फीमेल के यूट्रस में इंजेक्शन द्वारा डाला जाता है। 


उसके बाद, जो भी आगे का प्रोसेस है, शरीर में होता है, वह खुद ब खुद ही होता जाता है। अच्छा मतलब जो यह IVF द्वारा जो तरीके से बच्चों का पैदा होता है, उसको टेस्ट ट्यूब बेबी कहते हैं और बच्चा बाहर नहीं बनता, बच्चे शरीर में ही बनता है बस खाली वह जो फ्यूजन है, वह बाहर बनता है। लैब में होने वाले इस फर्टिलाइजेशन से पहले, मां बनने वाली स्त्री को कुछ हार्मोन इंजेक्शन या दवाइयों द्वारा दिए जाते हैं। जिसके वजह से, उसके शरीर में जो अंडे बनते हैं वह ज्यादा मात्रा में बनने लगते हैं।

 हर महीने, एक फीमेल के शरीर में एक अंडा बनता है लेकिन इन हारमोंस को लेने के बाद यह अंडे भारी मात्रा में बनने लगते हैं। अंडों के बनने के बाद, इन्हें एक फीमेल के शरीर से, इंजेक्शन द्वारा निकाला जाता है जिसके बाद इन्हें एक पेट्री डिश में पुरुष के शुक्राणु के साथ मिला दिया जाता है जहां पर यह पुरुष के शुक्राणु खुद-ब-खुद जाकर अंडे से मिल जाते हैं और फर्टिलाइजेशन हो जाता है। कभी कभार जब सारे शुक्राणु स्वस्थ ना हो, तो एक सिंगल स्वस्थ शुक्राणु को फीमेल के अंडे के अंदर सीधा इंजेक्शन द्वारा डाल दिया जाता है लैब में होने वाले इस फर्टिलाइजेशन के 3 से 5 दिन बाद जब एंब्रियो बन जाता है, 

फिर उस एंब्रियो को इंजेक्शन द्वारा ही, फीमेल के गर्भाशय में डाल दिया जाता है और वहां पर, यह एंब्रियो अपने आप ही बड़ के एक बच्चे का रूप लेता है। यह तो बहुत सही है यार, मतलब काफी सारे कपिल ऐसा करवा सकते हैं। IVF का ट्रीटमंट हर किसी के लिए कराना इतना आसान नहीं है क्योंकि इसमें काफी खर्च आता है। IVF की साइकिल में, यानी एक बार ट्राई करने में ही 1.5 से 2 लाख तक का खर्चा आ जाता है, जो हर कोई नहीं दे सकता। IVF की डिमांड अब दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है

 यह अब इतना आम हो चुका है कि अब तक करीब 80 लाख बच्चे इस तरीके से पैदा हो चुके हैं इसके द्वारा, कोई अगर सिंगल पैरंट भी बनना चाहता है तो वह भी मुमकिन है। और अगर होमोसेक्सुअल कपल भी यह बच्चा पैदा करना चाहे तो किसी और का अंडा और शुक्राणु लेकर, IVF द्वारा बच्चा पैदा कर सकते हैं। एक बात बताओ, यह IVF क्या हमेशा सही होता है? 

मतलब एक बार ट्राई करेंगे तो क्या बच्चा हो ही जाएगा?

 IVF हमेशा सफल नहीं होता किसी भी प्रक्रिया की तरह, IVF के पूरे पूरे संभावना होती हैं फेल होने के एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर फीमेल की उम्र 35 साल से कम है तो 40% संभावनाएं हैं, की IVF सफल होगा और जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, IVF द्वारा मां बनने के चांसेस भी कम होती जाती है आपको पता है IVF द्वारा प्रेग्नेंट होने के चांसेस को बढ़ाने के लिए, एक फीमेल में एक बार में कई सारे एमब्रीओस इंजेक्ट कर दिए जाते हैं क्योंकि जरूरी नहीं है कि हर एंब्रियो बच्चा बन ही जाएगा। काफी सारी एंब्रियो ऐसे होते हैं जो शुरू में ही दम तोड़ देते हैं। लेकिन ज्यादा एंब्रियो डालने की वजह से, IVF प्रेगनेंसी में, जुड़वा या तीन चार बच्चे एक साथ पैदा होने के चांसेस, नॉरमल प्रेगनेंसी के मुकाबले ज्यादा रहते हैं। 

पर किसी भी IVF ट्रीटमेंट में यह पूरी कोशिश रहती है कि ऐसा ना हो। क्योंकि ज्यादा बच्चे होना, मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक होता है। 3-4 एक साथ? इस प्रेगनेंसी में जो बच्चे पैदा होते हैं वह नॉर्मल ही होते हैं ना? ज्यादातर IVF बेबी, अभी 30 साल से नीचे नीचे के ही है क्योंकि जो पहली IVF बेबी पैदा हुई थी, लुइस ब्राउन, वह खुद ही अभी 41 साल की है। तो अभी तक तो इन बच्चों को नॉर्मल ही देखा जा रहा है एक छोटी सी बात जो नोटिस की जाती है, 

वह यह है की IVF द्वारा पैदा होने वाले ज्यादातर बच्चों का वजन कम होता है लेकिन ओवरऑल यह बच्चे नॉर्मल ही होते हैं। अब लुइस ब्राउन को ही देख लो, भैया कब वह 41 साल की हो गई है, 2 बच्चों की मां है और, खुशी खुशी अपनी लाइफ जी रही है। तो कैसे हैं आप सब लोग? मैं एकदम बढ़िया हूं और मुझे लगा कि मुझे हर आर्टिकल के आखिर में आपको बताना चाहिए कि मुझे यह प्रश्न कैसे आया? क्या सोचकर मैंने आर्टिकल की लिखा और आपकी जिंदगी खराब की, आपका टाइम वेस्ट किया।

 दरअसल इस आर्टिकल के लिए, अभी हाल ही में मेरी फैमिली में, एक कपल है, जो टेस्ट ट्यूब बेबी करने का ट्राई कर रहे हैं और उसके लिए वह डॉक्टर का चक्कर भी लगा रहे हैं तो बहुत सारा डिस्कशन हो रहा है, मैं कुछ कुछ पूछ रही थी, और वह उसका जवाब दे रहे थे। और मैंने सोचा कि यार, पहले टेस्ट ट्यूब बेबी टीवी पर कैसे सुनाई देता है, इंटरनेट पर आता था, अब यह इतना आम हो गया है, कि भैया अपने ही परिवार में कहीं सुनाई दे रहा है और एक दो लोगों के साथ डिस्कस करने के बाद मुझे यह पता चला कि, बहुत से लोग हैं जिनको जानकारी नहीं है, के टेस्ट ट्यूब बेबी कैसे बनता है? क्या होता है? 

उनको बस यह पता है कि हां कुछ ट्रीटमेंट हो रहा है कहीं लोग जाते हैं डॉक्टर के पास, और बस ठीक हो जाते हैं और बच्चा हो जाता है। तो मुझे लगा कि यार इसमें आर्टिकल लिखना जरूरी है, मुझे भी बहुत सारी चीजें नहीं पता है इसलिए और मुझे भी जानना जरूरी है, और अगर मैं जानलू तो आपको बताऊंगा तो ही, वह तो करना ही है तो इसलिए मैंने यह आर्टिकल बनाया, और आप सब लोगों के साथ शेयर किया अब इस आर्टिकल आपको कैसा लगा है, उतना तो आप कर ही सकते हो, कि मुझे बता दो कॉमेंट करके कमेंट करके जरूर बताना
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बुखार क्या है और हमें क्यों आता है?

August 02, 2020 1
बुखार क्या है और हमें क्यों आता है?


बुखार क्यों आता है?

 भले ही बाहर का तापमान समय-समय पर बदलता रहता है, हमारे शरीर का आंतरिक तापमान काफी स्थिर रहता है।  हमारे शरीर का आंतरिक तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस या 98.6 डिग्री फ़ारेनहाइट होता है।  लेकिन कभी-कभी यह आंतरिक तापमान कुछ हद तक बढ़ जाता है।  हम ठंड, झुलस महसूस करते हैं और बीमार महसूस करते हैं।

आमतौर पर, यह उच्च तापमान (बुखार) संक्रमण के कारण होता है।  लेकिन कैंसर, हीट स्ट्रोक आदि जैसी बीमारियां भी बुखार का कारण बन सकता हैं। जब भी हमें लगता है कि हमें बुखार हो गया है और हम बीमार महसूस कर रहे हैं, हम थर्मामीटर का उपयोग करते हैं।  थर्मामीटर एक उपकरण है जो हमें हमारे शरीर के आंतरिक तापमान को मापने में सक्षम बनाता है।

 एक सामान्य दिन पर, यह तापमान एक-एक डिग्री तक उतार-चढ़ाव करता रहता है।  लेकिन हम इसे बुखार ही कहते हैं जब तापमान 38 डिग्री सेल्सियस या 100 डिग्री फ़ारेनहाइट से अधिक हो जाता है।  लेकिन अब आपको विचार करना चाहिए ... हमारी

 आंतरिक व्यवस्था पूरी तरह से क्यों बढ़ रही है?

बहुत से लोग बुखार को एक बीमारी के रूप में देखते हैं ... लेकिन यह असत्य है।  बुखार वास्तव में एक अंतर्निहित बीमारी का लक्षण है।  वास्तव में, बुखार हमारी मदद करने के लिए हमारे शरीर का तरीका है।  अब आप सोच रहे होंगे HOW?  प्रश्न का उत्तर, हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को समझने में निहित है।  प्रतिरक्षा हमारे शरीर की क्षमता है ...

प्रतिरक्षा प्रणाली को समझने

हमें बीमारियों से बचाती है।  हमारी प्रतिरक्षा कोशिकाएँ रोगाणुओं (रोगजनकों) के कारण इन बीमारियों से लड़ती हैं, जिससे हमें बीमार होने से बचाया जा सके।  दरअसल, इन रोगजनकों के खिलाफ लड़ाई में शरीर के तापमान में वृद्धि होती है।  कई बैक्टीरिया और वायरस इस उच्च तापमान के लिए असहिष्णु हैं।  साथ ही, एक हालिया अध्ययन के अनुसार, यह भी पाया गया है ... कि उच्च आंतरिक तापमान भी कुछ प्रतिरक्षा कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि की ओर जाता है।  नए और पुराने शोध अध्ययनों से, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि रोग के कारण रोग से लड़ने के लिए हमारे शरीर का तरीका है।

ज्यादातर मामलों में, बुखार केवल 2 - 4 दिनों तक रहता है।  चूंकि हमें बुखार में बहुत पसीना आता है ... और हमारे शरीर में बहुत अधिक पानी की कमी होती है, इसलिए हमें सामान्य से अधिक पानी पीने की सलाह दी जाती है, और हमें आराम करना चाहिए।  आम तौर पर, हल्के बुखार में दवाओं की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन बहुत से लोग उस पल को गोली लेते हैं जो उन्हें बुखार लगता है।


इन दवाओं के अपने साइड इफेक्ट्स हैं, और उन्हें हर बार लेने के बाद अनुकूल नहीं है।  यदि आपका बुखार वास्तव में अधिक है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप काफी बीमार महसूस कर रहे हैं।  फिर डॉक्टर को देखने के लिए बेहतर है, और केवल निर्धारित दवाएं लें।


तो, उम्मीद है कि आप को पता चला है ... कि बुखार वास्तव में एक बीमारी नहीं है ... लेकिन हमारे शरीर का अंतर्निहित तंत्र हमें बीमारी से लड़ने में मदद करता है।  यदि आपके पास इन जैसे अन्य प्रश्न हैं, तो आप हमें जवाब देना चाहेंगे, ... आप हमें इसमें लिख सकते हैं  नीचे टिप्पणी अनुभाग।  हम सवालों के जवाब देने की पूरी कोशिश करेंगे।  अलविदा।
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Saturday, August 1, 2020

चांद में दाग, क्यों है?

August 01, 2020 0

चांद में दाग 

हमारे सुंदर से चांद को अगर करीब से देखा जाए तो पता चलता है कि चांद पर सिर्फ यह काले धब्बे ही नहीं बल्कि पूरा चांद अलग-अलग छोटे-बड़े साइज के खड्डों से भरा हुआ है और इन खंडों को craters कहते हैं। करीब 46 करोड़ साल पहले जब हमारा चांद बना था उस समय हमारे सोलर सिस्टम में काफी हलचल रहती थी छोटे बड़े पत्थर, एस्टेरॉइड, मेटियोरॉइड यहां वहां आतंक मचाते रहते थे। 

मतलब फुल उथल-पुथल। तब से यह चांद अलग-अलग तरह के पत्थरों के टकराने से पिटा हुआ है। और इसके काफी सारी craters, यह खड्डे जो आज हमें दिखाई देते हैं कई करोड़ साल पुराने हैं। लेकिन हमारा यह चांद, इन craters से पूरा ही भरा हुआ है। तो फिर यह 

काले धब्बे क्या है जो हमें अलग से दिखाई देते हैं?

 दूर से दिखने वाले यह काले धब्बे जिन्हें Maria कहते हैं इनकी कहानी थोड़ी अलग है। पुराने समय में टेलीस्कोप से देखने के बाद इन काले धब्बों को चांद के समुद्र की तरह देखा जाता था। लेकिन विज्ञान के उन्नति होते होते हमें पता चला यह काले धब्बे पानी के समुद्र नहीं है। माना जाता है कि यह काले धब्बे चांद पर ज्वालामुखी फूटने की वजह से लावा से भरे हुए हिस्से हैं और अब यह लावा से भरे हुए हिस्से सुख कर ऐसे काले दाग जैसे दिखाई देते हैं। चांद के अलग अलग हिस्सों पर यह लावा क्यों निकले इसके लिए अभी तक तो यही कहा जा रहा है की बड़े-बड़े एस्टेरॉइड्स के टकराने की वजह से ही चांद के अंदर से यह लावा फूट पड़े। लेकिन जब 

चांद पर इतने craters है तो धरती पर क्यों नहीं है?

 पत्थर तो धरती पर भी टकरा सकते हैं? यह बात सच है धरती की शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल होने की वजह से एक एस्टेरॉइड के चांद के मुकाबले धरती के तरफ गिरने के ज्यादा संभावनाएं हैं। लेकिन फिर भी चांद के ऊपर ज्यादा craters मौजूद है धरती के मुकाबले इसका कारण काफी सिंपल है। सबसे पहला कारण तो धरती का वायुमंडल ही है हमारी पृथ्वी के बाहर काफी सारे गैसेस के स्तर हैं जो उसके लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। ज्यादातर मेटियोरॉइड, और एस्टेरॉइड पृथ्वी के तरफ आते आते ही हमारे वायुमंडल में ही जल जाते हैं और धरती तक पहुंच ही नहीं पाते। बस यही होता है जब हम आसमान में टूटता तारा देखते हैं। और अगर आप जानना चाहते हैं कि यह 

धरती के वायुमंडल

हम बात कर रहे थे धरती के वायुमंडल की तो चांद के पास उसको बचाने के लिए ऐसा कोई वायुमंडल नहीं है और जब की चांद और पृथ्वी पर करीब करीब समान एस्टेरॉइड और मेटियोरॉइड गिरते हैं धरती तक ज्यादातर पहुंच ही नहीं पाते हैं। जय हो वायुमंडल बाबा की! चांद पर इतने सारे craters होने का दूसरा कारण यह है कि चांद पर ना तो कोई हवा है, ना पेड़ पौधे हैं और ना ही कोई मौसम बदलने का चक्कर है। तो जो craters एक बार चांद पर बन जाते हैं वह धरती के तरह पानी या हवा से भरते या मिटते नहीं है।

 चांद पर बना छोटे से छोटा निशान कभी नहीं मिटता और इसीलिए जो अंतरिक्ष यात्री कई साल पहले चांद पर गए थे उनके पैरों के निशान आज तक वहां मौजूद हैं। इसके अलावा हमारे धरती पर होने वाले ज्वालामुखी और भूकंप भी धरती के इन craters का टाइम टू टाइम सफाया करते रहते हैं। तो बेचारा चांद, पृथ्वी के मुकाबले अपनी तरफ कम पत्थरों को आकर्षित करता है लेकिन जो भी पत्थर एक बार चांद की तरफ चला जाए वह वहां पहुंच ही जाता है। और एक बार वहां कोई निशान या खड्डा या कोई बड़ा सा crater बन जाए तो वह हमेशा के लिए वहीं जम जाता है।
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सुबह उठ के बाद मुंह से बदबू क्यों आती है?

August 01, 2020 0
सांसों की बदबू के कारण।

मुंह से बदबू क्यों आती है? 

एक इंसान रात को सोते समय सुबह उठते वक्त काफी अलग होता है सुबह सुबह उटते समय ज्यादा आराम के अलावा एक और चीज है जो ज्यादा बढ़ जाती है। हमारे मुंह की बदबू। हम सब के साथ यह रोज़ सुबह होता ही है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि रात भर में हमारे मुंह के अंदर ऐसा क्या होता है? कि सुबह उटके सड़े हुए अंडे और बदबूदार मोजों जैसी बदबू आती है मतलब ऐसा भी क्या हुआ रात भर में दिन में तो सब ठीक था? 

सांसों की बदबू के कारण। आपको पता है यह क्यों होता है? 
बैक्टीरिया के वजह से। हमारे मुंह के अंदर का मौसम बहुत ही गर्म और खाने के कुछ छेटे-छोटे टुकडे यानि के कुछ फूड पार्टिकल से भरा होता है और यही मौसम और यही फूड पलर्टिकल बैक्टीरिया को बहुत पसंद आते हैं। कुछ बैक्टीरिया हमारे मुंह के अंदर हमेशा मौजूद होते हैं। जो हमारे मुंह में मौजूद बची कुची खाने और डेंट सेल्स को खाते रहते हैं। क्योंकि यह बैक्टीरिया सारा टाइम हमारे मुंह में मौजूद होते हैं।

 यह बाकी खतरनाक बैक्टीरिया को हमारे मुंह के अंदरं नहीं आने देते और हमें उनसे बचाते हैं। और इससे पहले आप अपने दिमाग में इनकी एक अच्छी इमेज बना ले में आपको बता दूं की इन्हीं बैक्टीरिया के वजह से हमें कैविटी और मसूड़ों की बीमारियां होती है और यही बैक्टीरिया जिम्मेदार है हमारे मुंह के बदबू का। 


लेकिन ऐसा क्या करते हैं यह बैक्टीरिया हमारे मुंह के अंदर? 
जैसे- जैसे यह बैक्टंरिया हमारे मुंह के अंदर फूट पार्टिकल्स को खाते रहते हैं इनके शरीर से कुछ कंपाउंड वेस्ट की तरह निकलते रहते हैं और यह बदबू उन्हीं वेस्ट कंपाउंड की होतै है। 

बैक्टेरिया से नेकलने वाले यह वेस्ट कंपाउंड अलग-अलग तरह के होते हैं औरै इनके स्मैल भी अलग-अलग होती है। जेसे कि हाइड्रोजन सल्फाइड जो सड़े हुए अंडो जैसा स्मेल करता है। मेथेनथिओल(Methanethiol) जिसे फर्ट स्मेल भी कहते है। और कड़वेरिने(Cadaverine) जो सड़े हुए मीट जैसा स्मैल करता है। तो ऐसे ही कई अलग अलग तरह की कैपाउंड है जो बैक्टीरिया हमारे मुंह में रिलीज करता है। और हमारा मुंह इन्हीं कंपाउंड्स की बदबू छोड़ता रहता है तो अगर अब आपको कोई बोले तेरे मुंह से सड़े हुए अंडे की बदबू आ रही है तो आप कह सकते हैं

 इट्स हाइड्रोजन सल्फाइड! अच्छा, लेकिन अगर बैक्टीरिया यह बदबू छोड़ता है और बैक्टीरैया हमारी मुह में सारा टाइम मौजूद होते है तो फिर 

बदबू सुबह ही क्यों आती है? 

दिन भर में सिलाईभा की मदद से हमारे मुह में मौजूद बैक्टीरिया और फूड पार्टिक्लस। हमारे अंदर जाकर टाइम टू टाइम साफ होते रहते हैं लेकिन रात में ऐसा नहीं हो पता। रात में हमारा मुह उताना सिलाईभा नहीं बना पाता जितना की वो दिन भर में बनाता है। और इसी वजह से इन बैक्टीरिया का सफाया नहीं हो पाता। जिसके कारण यह बैल्टीरिया हमारे मुंह के अंदर मौजूद फुड पार्टिकल और डैड सेल्स को खाते रहते हैं और भारी मात्रा में बढ़ते ही रहते हैं और जब बैक्टेरिया बढ़ेंगे तो उनके द्वारा छोड़ी गई स्मेल तो बढ़ेगी ही ना।

 तो मैं आप सबको बता सकता हूं की यह बदबू मेरे मुंह से नहीं बल्कि बैटेरिया से आती है। लेकिन इस से बदबू तो नहीं जाएगी ना। तो अगर आप चाहते हैं कि सुबह उठकर आपके 

मुंह की दुर्गंध भगाने के तरीका -

मुंह से यह बदबू कम आए आपके आसपास वालों का भला हो जाए। तो रात को सोने से पहले ब्रश करना, अपनी जीभ साफ करना अपने मुंह को साफ करना जैसी आदतें आपकी मुंह से बदबू हटाने में मदद कर सकती हैं। 
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Friday, July 31, 2020

बारकोड रीडर के वैज्ञानिक कौन हैं?

July 31, 2020 0

बारकोड रीडर के वैज्ञानिक कौन है?। बारकोड रीडर क्या है?
barcode readers

बारकोड रीडर अक्सर दोस्तों यह शब्द को हमें बहुत बार सुनने को आता है। बारकोड रीडर क्या है? और वैसे ही हमारे मन में यह सवाल भी आता है बारकोड रीडर किस वैज्ञानिक ने बनाया। बारकोड रीडर की खोज कब हुई। तो चलिए दोस्तों जानते हैं बारकोड रीडर का इतिहास

बारकोड रीडर क्या है?

बारकोड रीडर एक ऐसा यंत्र है जिसकी सहायता से हम आज किसी भी प्रोडक्ट या जो कोई ऐसी वस्तु जो किसी इंडस्ट्रीज से निकलती है उदाहरण के तौर पर जैसे कोई मेडिसिन रोज के जीवन मरा की कुछ चीजें जैसे साबुन इलेक्ट्रॉनिक चीजें इन सभी के जानकारी बहुत ही अच्छी तरीके से हम पा सकते हैं

हम किस प्रकार की जानकारी पा सकते हैं? और कैसे?

दोस्तों आपने कुछ ऐसा देखा होगा कि जो कुछ आप इलेक्ट्रॉनिक या कोई भी ऐसी वस्तु जो कंपनी से निकलती है तो उस पर आपने खड़े लाइन में कुछ ऐसी पटिया देखी होंगी जिस पर कुछ लंबी लाइन और नीचे कुछ गणित के अंक होते हैं यह क्या होता है यही बारकोड होता है। और बारकोड यंत्र इसी लाइन को एक लेजर बीम की मदद से स्कैन करके उसका मूल्य तथा वह किस दिन बना है। और उसके बारे में जो कुछ जानकारी कंपनी ने उस बारकोड में दी है वह सब कुछ मैं बता सकता है।

बारकोड रीडर के वैज्ञानिक कौन हैं?

बारकोड की खोज कब हुई। बारकोड रीडर कब खोजा गया। बारकोड रीडर का अविष्‍कार 1940 में हुआ था। ओर अविष्‍कार करने वाले तो वैज्ञानिक थे। जोसेफ वुडलैंड तथा बर्नाड सिल्‍वर ने मिलकर किया था।  और दोस्तों एक बात हम आपको बताते हैं। तभी के समय में बारकोड रीडर को प्रचारित करने का श्रेय ऐलन हैबर मैन को जाता है। 

फिर उसके बाद भारत में वर्ष 1998 में नेशनल इन्‍फोर्मेशन इं‍डस्ट्रियल वर्क फोर्स के द्वारा सभी प्रोडक्ट मतलब कि सभी उत्पादन ऊपर बारकोड लगाना अनिवार्य कर दिया गया है।

बारकोड रीडर काम कैसे करता है?

किसी भी उत्पात पर जो खड़ी रेखाएं जिसे हम बारकोड कहते हैं। उसे एक लेजर बीम की सहायता से स्कैन  करता है और उस उत्पाद की जो जानकारी है। वह कंप्यूटर तक पहुंचाता है और कंप्यूटर की मदद से हम तक उस जानकारी को पहुंचाया जाता है। और जो कुछ जानकारी हमें मिलती है। वह जानकारी वह उत्पाद बनाने वाली कंपनी उस बारकोड की खड़ी लाइनों के बीच में इस प्रकार लिखती है कि हमें वह पढ़ना नहीं आ सकता उसे बारकोड रीडर की सहायता से ही पढ़ा जा सकता है। अभी तो बारकोड रीडर का प्रयोग बैंक व पोस्‍ट ऑफिस में भी किया जाता है।
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Thursday, July 30, 2020

हिचकी क्यों आती है? इसका कारण । लगातार हिचकी (hiccup) आना

July 30, 2020 0
हिचकी क्यों आती है? इसका कारण । लगातार हिचकी आना

हिचकी 'hiccup' आती क्यों है?। हिचकी क्यों आती है वैज्ञानिक कारण


मुझे hiccup आई और मैंने पूछा दादी!
दादी...! अरे क्या हुआ,
मैं बोला... हिचकी (hiccup)?
दादी बोली.. जरूर कोई याद कर रहा होगा! पक्का कोई गाली दे रहा है तू नाम लेकर देखो अभी ठीक हो जाएगी।

मैं बोला दादी से, रहने दो।
फिर से हिचकी मम्मी!

अब जानते हैं हिचकी (hiccup) क्यों आती है इसका कारण

तो हम सबके साथ यह हिचकी वाला टाइम कई बार आ ही जाता है। जिसमें हमें समझ ही नहीं आता कि हमारे शरीर को हो क्या गया है? और यह अजीब अजीब आवाजें क्यों आ रही है? लेकिन इस हिचकी को ठीक करने से पहले आइए हम यह जान लेते हैं कि यह हिचकी आती क्यों है? और जब हिचकी आती है तो हमारे बॉडी के अंदर क्या हो रहा होता है? क्या?

यह भी जाने-RO का पानी मीठा क्यों लगता है?। आप RO फिल्टर खरीदने की सोच रहे हैं?

हिचकी (hiccup) आने के इस कहानी का मेन हीरो है हमारा अपना डायाफ्राम। हमारे फेफड़ों के नीचे मसल्स से बनी एक प्लेट होती है जिसे हम डायाफ्राम कहते हैं। और यह डायाफ्राम ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने में हमारी मदद करता है। जब भी यह डायाफ्राम कॉन्ट्रैक्ट यानी कसता है तो हमारे फेफड़ों में हवा भर जाती है और जब यह रिलेक्स करता है तो हमारे फेफड़ों से मुंह से सारी हवा बाहर निकल जाती है।

"लगातार हिचकी आना" ऐसे ही कुछ कारणों से होता है। हमारे इस डायाफ्राम को कब मूव करना है और कैसे मूव करना है यह हमारा दिमाग तय करता है और डायफ्राम को मूव करने का आदेश भी हमारा दिमाग ही देता है। तो यह डायफ्राम हमें सांस लेने में मदद करता है? लेकिन यह हिचकी कैसे आती है? देखा गया है कि जब भी हमें हिचकी आती है तो हमारा दिमाग, हमारे डायाफ्राम को एकदम से कसने का सिग्नल देता है जिसके कारण, हमारे गले के अंदर खूब सारी हवा एकदम से चली जाती है तो जब हमारी बॉडी एकदम से खूब सारी हवा अपने अंदर लेने की कोशिश करती है तो हमारी गली में मौजूद वोकल कॉर्ड एकदम से बंद हो जाती है और यह आवाज उन्हीं के बंद होने की आती है।

लेकिन ऐसा क्यों होता है?

[हिचकी] [हिचकी] लेकिन ऐसा क्यों होता है? हमें यह तो पता है कि हिचकी आते समय हमारे अंदर क्या होता है लेकिन हम अभी तक यह नहीं पता लगा पाए है कि यह हिचकी आती क्यों है? और हिचकी आने का कारण अभी तक एक मिस्ट्री एक रहस्य ही है। ज्यादातर समय देखा गया है कि जब हमारे डायाफ्राम के नीचे मौजूद स्टमक किसी भी कारण से स्ट्रेच होता है तो हमें हिचकी आने लगती है

जैसे कि हमारे स्टमक के अंदर खूब सारी हवा चले जाना ज्यादा तेजी से खाना या पीना साथ ही साथ ज्यादा रोने, हंसने, या एक्साइटमेंट की वजह से भी हिचकियां आते हुए देखा गया है। हमारे साथ साथ बहुत से और जानवरों को भी हिचकी आती है और सिर्फ बड़ों को ही नहीं बल्कि पेट के अंदर होने वाले बच्चों को भी हिचकियां आते हुए देखा गया है। वैज्ञानिक अभी भी इस प्रश्न का जवाब खोजने में लगे हुए हैं और अभी तक कुछ थ्योरीस के मुताबिक यही कहा जा रहा है। कि यह 
हिचकी हमें हमारे एवोल्यूशन के द्वारा मिला एक तोहफा हो सकता है।
 जिसका पहले जरूर कोई काम रहा होगा पर अब इंसानों में, शायद इसका कोई फंक्शन नहीं है। कैसा है ना! इंसान ने इतने सारे सवालों के जवाब ढूंढ लिए हैं पर यह छोटी सी हिचकी के पीछे का कारण हम अभी तक नहीं समझ पाए हैं।

जानिए-सर्दी और गर्मी के मौसम में पसीना आना। हमारे शरीर पर पसीना क्यो आता हैं?

हिचकी अपने आप बंद कैसे होती हैं?

की बार खाना खाते वक्त हिचकी (hiccup) आना ऐसे होता है अब हम जानते है। कि हम .. यह, तो है! ओए! हिचकी गई! लेकिन कैसे? ज्यादातर समय बिना कुछ किए ही यह हिचकी चली जाती है लेकिन अगर लंबे समय तक यह हिचकी ठीक ना हो तो लोग इसे ठीक करने के लिए काफी अलग-अलग चीजें ट्राई करते हैं जैसे कि एक साथ खूब सारा पानी पीना अपने सांस को कुछ देर तक रोक के रखना या किसी एक जगह पर ध्यान लगाना पर यह तरीके भी हर किसी के लिए काम नहीं करते वैसे आप क्या कहते हैं जब आपको हिचकी आती है तो?

हिचकी आने के फायदे तो आप जान गए हैं।

अगर आपके पास भी हिचकी को रोकने का कोई ऐसा ही तरीका है तो कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा ताकि आपका आजमाया तरीका कोई अपने बुरे समय में, ट्राई कर सकें। आपको पता ही है, मैं क्या कहने वाला हूं, और आपको पता ही है आपको क्या करना है लेकिन फिर भी तोते की तरह बोलते हुए मैं आपको याद दिला दूंगा कि अगर आपको यह आर्टिकल अच्छा लगा हो तो आप इसे लाइक कर सकते हैं, शेयर कर सकते हैं कॉमेंट्स कर सकते हैं

धन्यवाद...
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RO का पानी मीठा क्यों लगता है?। आप RO फिल्टर खरीदने की सोच रहे हैं?

July 30, 2020 0
RO, TDS, RO- Reverse Osmosis

क्या या आप RO फिल्टर खरीदने की सोच रहे हैं?

 भैया पहले यह आर्टिकल पढ़ लो तो कुछ ही समय पहले न्यूज़ पेपर में एक खबर आई थी, के WHO ने वार्निंग दी है के भैया, RO का पानी आपकी सेहत खराब कर सकता है। अरे! क्या सही है यह बात?

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 क्या सही है यह बात?

RO- Reverse Osmosis एक तरीका है पानी को फिल्टर करने का पानी में मौजूद कीटाणुओं और गंदगी को साफ करने का और पीने के पानी को साफ करने के लिए RO फिल्टर आजकल घर-घर में इस्तेमाल हो रहे हैं। RO फिल्टर से पानी पीने वाले लोगों को कहीं और का पानी नहीं जमता क्योंकि RO से निकलने वाला यह पानी, काफी मीठा और टेस्टी लगता है। लेकिन सवाल यह है कि इस मीठे पानी से हमें क्या नुकसान हो सकता है?

आरो के पानी से हमारे शरीर को क्या हानि हो सकती है?
पानी में मौजूद गंदगी को निकालने के साथ-साथ यह RO, पानी में मौजूद मिनरल जो हमारे शरीर के लिए आवश्यक हैं। को भी निकाल देता है, इससे फिल्टर होकर पानी इतना साफ हो जाता है, इसमें मौजूद कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, पोटैशियम जैसे कई सारी जरूरी मिनरल्स साफ हो जाते हैं।

RO का पानी मीठा क्यों लगता है?

और यही एक कारण है कि RO का पानी हमें मीठा लगता है। आपने कभी TDS मीटर का नाम सुना है? पानी में मौजूद मिनरल और बाकी सॉलिड्स को एक TDS मीटर से नापा जाता है। TDS- Total Dissolved Solvent यह TDS मीटर हमें यह बताता है के पानी में कितनी सॉलिड चीजें मौजूद हैं। पीने के पानी का TDS, ना तो बहुत ज्यादा होना चाहिए और ना ही बहुत कम। Bureau of Indian Standards जो भारत में इन सब चीजों का स्टैंडर्ड तय करती हैं उनके मुताबिक पीने के पानी का TDS 500mg/l से कम ही होना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ WHO के मुताबिक अगर आप 100mg/l TDS से कम का पानी पीते हैं तो यह आप को नुकसान पहुंचा सकता है।

 ज्यादातर RO के पानी का TDS कितना होता है?

और आपको पता है कि ज्यादातर RO फिल्टर पानी का TDS 100 से कम ही होता है। हमारे शरीर में होने वाले कई कामों के लिए हमें मिनरल्स की जरूरत होती है। और पानी में मिनरल्स की कमी के कारण। हड्डिया कमजोर होने, ज्यादा थकान महसूस करने, पैदा हुए बच्चों का "कम वजन होने" और "दिल की बीमारियां" जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।

यह किसने प्रमाणित किया?

यह सब मैं अपने मन से नहीं कह रही हूं। WHO यानी World Health Organisation द्वारा रिलीज की गई एक रिपोर्ट में यह सब बताया गया है। लेकिन अगर आप यह रिपोर्ट ना भी देखें, तब भी आप यह सोच सकते हैं।

बिना मिनरल्स के हमारा शरीर कैसे काम करेगा?

 के बिना मिनरल्स के हमारा शरीर कैसे काम करेगा? और मिनरल्स की कमी होने से, दिक्कत तो होगी ही ना? मुझे पता है अब आप क्या सोच रहे हैं पानी से ही थोड़ी ना मिलने मिलते हैं? ज्यादातर मिनरल्स तो खाने से मिलते हैं! हम तो खाने में ले लेंगे। देखा गया है कि कम TDS वाले पानी में, कम सॉलिड्स होने की वजह से बाकी के सॉलिड्स को खींचने की क्षमता ज्यादा होती है। इसीलिए जब यह पानी शरीर में ज्यादा है तो शरीर में मौजूद मिनरल भी खींच लेता है और यूरिन के द्वारा बाहर फेंक देता है

WHO इस रिपोर्ट में इंसानों और जानवरों पर किए गए प्रयोगों द्वारा यह पता लगाया गया है 100 या उससे कम TDS वाले पानी को पीने से ज्यादा प्यास लगती है, ज्यादा यूरिन आता है और इसी वजह से ज्यादा से ज्यादा मिनरल्स, शरीर से बाहर निकल जाते हैं। मतलब पानी पीके तो मिनिरल मिले नहीं हमारे शरीर में जो मिनरल मौजूद थे, वह भी बाहर निकल गए। इतना ही नहीं यह भी देखा गया है कि अगर आप कम TDS वाले पानी से, यह जो कम मिनरल वाला पानी है इससे खाना पकाते हैं खाने में डालते हैं तो यह खाने में मौजूद मिनरल की मात्रा को भी कम कर देता। मतलब RO ने तो मचा रखी है!

जानिए-सर्दी और गर्मी के मौसम में पसीना आना। हमारे शरीर पर पसीना क्यो आता हैं?

 वैसे ही आज कल के डायट में मिनरल की मात्रा कितनी कम होती है, ऊपर से अगर पानी से भी निकल जाए, खाना बनाते समय खाने से भी कम हो जाए तो क्या ही करना है? तो यह बात बिल्कुल सच है की "WHO 100mg/l से कम TDS के पानी को पीने की सलाह बिल्कुल नहीं देता है।" और अगर आप इस परेशानी को सुझाना चाहते हैं।

RO के पानी का TDS कितना होना चाहिए?

 तो आप अपने RO फिल्टर का TDS एडजस्ट भी करवा सकते हैं जोकि 500 से कम, और 100 से ज्यादा होना चाहिए। साथ ही साथ, कई लोग अपने RO फिल्टर में remineralize वाला सिस्टम लगवा लेते हैं। जिससे जो मिनरल्स है, जरूरी मिनरल्स है, वह ऊपर से ऐड किए जाते हैं। लेकिन इस बात का कोई सबूत मौजूद नहीं है की इससे हमारी अंधेर जो मिनरल की कमी है, उसकी पूर्ति होगी या नहीं।

पानी को साफ करने का बेहतरीन तरीका क्या है?

आपको पता है कि पानी को साफ करने का बेहतरीन तरीका क्या है? उसको उबालकर पीना। क्योंकि जब आप पानी को उबाल ते हैं, तो उसमें मौजूद कीटाणु और गंदगी अपने आप ही साफ हो जाती हैं। RO का पानी पीने में तो अच्छा लगता है, लेकिन इसे पीने के बाद हमारा शरीर, बिल्कुल भी अच्छा महसूस नहीं करता।

इन सभी बातों का हजारों साल पहले किस किताब में उल्लेख किया है?

आपको पता है कि जब मैं WHO की यह रिपोर्ट पढ़ रही थी उसने उन्होंने "ऋग्वेद" का जिक्र किया हुआ था। मतलब, मॉडर्न साइंस भी यह जो हजारों साल पुरानी किताब, हमारी ऋग्वेद है, जिसमें इन सब चीजों के बारे में लिखा हुआ है उसको भी वह लोग एक स्टैंडर्ड की तरह लेकर चलते हैं। तो ऋग्वेद में यह लिखा गया है, के पानी साफ होने के साथ-साथ, उसमें प्राकृतिक पोषक तत्व है, मिनरल्स है वह मौजूद होनी चाहिए, सॉल्टस मौजूद होनी चाहिए और अगर आप दिखे तो पुराने समय में हम पानी को कैसे साफ करते थे, लोग पानी को उबालकर पीते थे, या तो तांबे के बर्तन में पीते थे या घड़े में पीते थे और कुछ ना कुछ विज्ञान जरूर होगी इनके पीछे भी।

तो अगर आप चाहते हैं कि मैं इस प्रश्न का भी जवाब ढूंढो के पानी को कैसे पीना चाहिए, उसको साफ कैसे करना चाहिए क्या बेस्ट तरीका है पानी पीने का, उसको साफ करने का मुझे कमेंट करके जरूर करेंगा, धन्यवाद...
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Wednesday, July 29, 2020

सर्दी के मौसम में पसीना आना। हमारे शरीर पर पसीना क्यो आता हैं?

July 29, 2020 0
Why do you sweat?

हम चाहे काम करें या ना करे। या बुखार में तड़पे मसालेदार खाना खाए। या स्टेज में पहली बार गाना गाए। एक चीज तो निकल ही आती है अरे भैया, पसीना! कभी-कबार तो हमे सर्दी के मौसम में पसीना आता है। तो जानते हैं क्या है इसकी वजह..

लेकिन क्यों पसीना आता है?

हम सब को पसीना आता है। तो जाहिर सी बात है इसके पीछे भी कोई कारण होगा। क्योंकि हमें पता है हमारा शरीर ऐसे ही कुछ नहीं करता। और हर चीज के पीछे का अपना एक कारण जरूर होता है। हमें बहुत सारी अलग-अलग परिस्थितियों में पसीना आ सकता है। लेकिन एक समय जब हमारा शरीर सबसे ज्यादा पसीना छोड़ता है वह है एक्सरसाइज का समय! लेकिन क्या होता है एक्सरसाइज करते समय जो हमें इतना पसीना आता है?

क्या होता है एक्सरसाइज करते समय?

तो होता क्या है कि जब भी हम एक्सरसाइज करते हैं। और जैसे-जैसे हम अपनी तेजी बढ़ाते हैं हमारी मसल्स को ज्यादा काम करना पड़ता है। जिसकी वजह से उन्हें ज्यादा एजेंसी की जरूरत पड़ती है एनर्जी को पूरा करने के लिए हमारे शरीर में कुछ केमिकल रिएक्शंस तेजी से होने लगती है जिसके कारण हमारे शरीर के अंदर काफी सारे हिट या गर्मी पैदा हो जाती है। ज्यादा गर्मी हमारे शरीर के लिए अच्छी नहीं है इसीलिए इस गर्मी को कम करने के लिए, हमारे बॉडी को ठंडा करने के लिए हमारा यह शरीर पसीना छोड़ता है। तो इसका मतलब हमारा बॉडी खुद को ठंडा करने के लिए पसीना छोड़ती है।

 लेकिन कैसे शरीर को ठंडा करता है?

 हमारी त्वचा के नीचे पसीना छोड़ने वाले स्वेट ग्लैंड (Sweat Glands) हमेशा मौजूद होते हैं। और जब भी हमारे शरीर में गर्मी बढ़ती है तो हमारे दिमाग में मौजूद Hypothalamus जो हमारे पूरे शरीर की टेंपरेचर को रेगुलेट करता है। स्वेट गलैंड्स को आदेश देता है कि बच्चों… हाइपोथैलेमस के सिग्नल के बाद यह स्वेट गलैंड्स (Sweat Glands) हमारी त्वचा में पसीने की बूंदे छोड़ते है। इन बूंदों के सूखते सूखते वाष्पीकरण के मदद से हमारा शरीर ठंडा होने लगता है। हमारे शरीर में करीब 30 लाख से भी ज्यादा स्वेट गलैंड्स मौजूद होते हैं। और यह हमारे पूरे शरीर में फैले हुए हैं। इन स्वेट ग्लैंड की मात्रा हमारे हथेलियों, पैरों के नीचे और सर पे सबसे ज्यादा होती है। और इसीलिए हमें इन जगहों पर सबसे ज्यादा पसीना आता है। 

हमें कब-कब पसीना ज्यादा आता है?

हमें पसीना बस एक्सरसाइज करते हुए ही नहीं बल्कि मिर्ची वाला खाना खा के या कोई इंटरव्यू देके जिसमें हम बहुत नर्वस हो तभी आता है। क्योंकि देखा गया है कि इन परिस्थितियों में भी हमारे बॉडी का टेंपरेचर बढ़ता है। और अगर गर्मी बढ़ेगी तो ठंडा तो करना ही पड़ेगा। हमारे लिए यह पसीना कितना जरूरी है यह हमें तब समझ आएगा जब हमें किसी दिन यह पसीना आना बंद हो जाए और ऐसा होता भी है, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं।

 जिनकी स्वेट गलैंड्स सही से काम नहीं करते हैं और उन्हें सही मात्रा में पसीना नहीं आता। इस कंडीशन को Anhidrosis कहते हैं। और ऐसे लोग ज्यादा एक्सरसाइज करना या ज्यादा गर्मी में रहना सहन नहीं कर सकते हैं। क्योंकि उनकी बॉडी खुद को ठंडा नहीं कर पाती ज्यादा गर्म होने की वजह से उन्हें हीट स्ट्रोक आ सकता है। जिसके कारण उनकी जान जाने तक का भी खतरा रहता है।

तो अब आपको समझ आ ही गया होगा कि पसीना आना हमारे लिए कितना जरूरी है वैसे आप देख ही रहे होंगे कि हमारे शरीर के पास हर बात का सलूशन है।
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