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Saturday, August 1, 2020

सुबह उठ के बाद मुंह से बदबू क्यों आती है?

August 01, 2020 0
सांसों की बदबू के कारण।

मुंह से बदबू क्यों आती है? 

एक इंसान रात को सोते समय सुबह उठते वक्त काफी अलग होता है सुबह सुबह उटते समय ज्यादा आराम के अलावा एक और चीज है जो ज्यादा बढ़ जाती है। हमारे मुंह की बदबू। हम सब के साथ यह रोज़ सुबह होता ही है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि रात भर में हमारे मुंह के अंदर ऐसा क्या होता है? कि सुबह उटके सड़े हुए अंडे और बदबूदार मोजों जैसी बदबू आती है मतलब ऐसा भी क्या हुआ रात भर में दिन में तो सब ठीक था? 

सांसों की बदबू के कारण। आपको पता है यह क्यों होता है? 
बैक्टीरिया के वजह से। हमारे मुंह के अंदर का मौसम बहुत ही गर्म और खाने के कुछ छेटे-छोटे टुकडे यानि के कुछ फूड पार्टिकल से भरा होता है और यही मौसम और यही फूड पलर्टिकल बैक्टीरिया को बहुत पसंद आते हैं। कुछ बैक्टीरिया हमारे मुंह के अंदर हमेशा मौजूद होते हैं। जो हमारे मुंह में मौजूद बची कुची खाने और डेंट सेल्स को खाते रहते हैं। क्योंकि यह बैक्टीरिया सारा टाइम हमारे मुंह में मौजूद होते हैं।

 यह बाकी खतरनाक बैक्टीरिया को हमारे मुंह के अंदरं नहीं आने देते और हमें उनसे बचाते हैं। और इससे पहले आप अपने दिमाग में इनकी एक अच्छी इमेज बना ले में आपको बता दूं की इन्हीं बैक्टीरिया के वजह से हमें कैविटी और मसूड़ों की बीमारियां होती है और यही बैक्टीरिया जिम्मेदार है हमारे मुंह के बदबू का। 


लेकिन ऐसा क्या करते हैं यह बैक्टीरिया हमारे मुंह के अंदर? 
जैसे- जैसे यह बैक्टंरिया हमारे मुंह के अंदर फूट पार्टिकल्स को खाते रहते हैं इनके शरीर से कुछ कंपाउंड वेस्ट की तरह निकलते रहते हैं और यह बदबू उन्हीं वेस्ट कंपाउंड की होतै है। 

बैक्टेरिया से नेकलने वाले यह वेस्ट कंपाउंड अलग-अलग तरह के होते हैं औरै इनके स्मैल भी अलग-अलग होती है। जेसे कि हाइड्रोजन सल्फाइड जो सड़े हुए अंडो जैसा स्मेल करता है। मेथेनथिओल(Methanethiol) जिसे फर्ट स्मेल भी कहते है। और कड़वेरिने(Cadaverine) जो सड़े हुए मीट जैसा स्मैल करता है। तो ऐसे ही कई अलग अलग तरह की कैपाउंड है जो बैक्टीरिया हमारे मुंह में रिलीज करता है। और हमारा मुंह इन्हीं कंपाउंड्स की बदबू छोड़ता रहता है तो अगर अब आपको कोई बोले तेरे मुंह से सड़े हुए अंडे की बदबू आ रही है तो आप कह सकते हैं

 इट्स हाइड्रोजन सल्फाइड! अच्छा, लेकिन अगर बैक्टीरिया यह बदबू छोड़ता है और बैक्टीरैया हमारी मुह में सारा टाइम मौजूद होते है तो फिर 

बदबू सुबह ही क्यों आती है? 

दिन भर में सिलाईभा की मदद से हमारे मुह में मौजूद बैक्टीरिया और फूड पार्टिक्लस। हमारे अंदर जाकर टाइम टू टाइम साफ होते रहते हैं लेकिन रात में ऐसा नहीं हो पता। रात में हमारा मुह उताना सिलाईभा नहीं बना पाता जितना की वो दिन भर में बनाता है। और इसी वजह से इन बैक्टीरिया का सफाया नहीं हो पाता। जिसके कारण यह बैल्टीरिया हमारे मुंह के अंदर मौजूद फुड पार्टिकल और डैड सेल्स को खाते रहते हैं और भारी मात्रा में बढ़ते ही रहते हैं और जब बैक्टेरिया बढ़ेंगे तो उनके द्वारा छोड़ी गई स्मेल तो बढ़ेगी ही ना।

 तो मैं आप सबको बता सकता हूं की यह बदबू मेरे मुंह से नहीं बल्कि बैटेरिया से आती है। लेकिन इस से बदबू तो नहीं जाएगी ना। तो अगर आप चाहते हैं कि सुबह उठकर आपके 

मुंह की दुर्गंध भगाने के तरीका -

मुंह से यह बदबू कम आए आपके आसपास वालों का भला हो जाए। तो रात को सोने से पहले ब्रश करना, अपनी जीभ साफ करना अपने मुंह को साफ करना जैसी आदतें आपकी मुंह से बदबू हटाने में मदद कर सकती हैं। 
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Friday, July 31, 2020

बारकोड रीडर के वैज्ञानिक कौन हैं?

July 31, 2020 0

बारकोड रीडर के वैज्ञानिक कौन है?। बारकोड रीडर क्या है?
barcode readers

बारकोड रीडर अक्सर दोस्तों यह शब्द को हमें बहुत बार सुनने को आता है। बारकोड रीडर क्या है? और वैसे ही हमारे मन में यह सवाल भी आता है बारकोड रीडर किस वैज्ञानिक ने बनाया। बारकोड रीडर की खोज कब हुई। तो चलिए दोस्तों जानते हैं बारकोड रीडर का इतिहास

बारकोड रीडर क्या है?

बारकोड रीडर एक ऐसा यंत्र है जिसकी सहायता से हम आज किसी भी प्रोडक्ट या जो कोई ऐसी वस्तु जो किसी इंडस्ट्रीज से निकलती है उदाहरण के तौर पर जैसे कोई मेडिसिन रोज के जीवन मरा की कुछ चीजें जैसे साबुन इलेक्ट्रॉनिक चीजें इन सभी के जानकारी बहुत ही अच्छी तरीके से हम पा सकते हैं

हम किस प्रकार की जानकारी पा सकते हैं? और कैसे?

दोस्तों आपने कुछ ऐसा देखा होगा कि जो कुछ आप इलेक्ट्रॉनिक या कोई भी ऐसी वस्तु जो कंपनी से निकलती है तो उस पर आपने खड़े लाइन में कुछ ऐसी पटिया देखी होंगी जिस पर कुछ लंबी लाइन और नीचे कुछ गणित के अंक होते हैं यह क्या होता है यही बारकोड होता है। और बारकोड यंत्र इसी लाइन को एक लेजर बीम की मदद से स्कैन करके उसका मूल्य तथा वह किस दिन बना है। और उसके बारे में जो कुछ जानकारी कंपनी ने उस बारकोड में दी है वह सब कुछ मैं बता सकता है।

बारकोड रीडर के वैज्ञानिक कौन हैं?

बारकोड की खोज कब हुई। बारकोड रीडर कब खोजा गया। बारकोड रीडर का अविष्‍कार 1940 में हुआ था। ओर अविष्‍कार करने वाले तो वैज्ञानिक थे। जोसेफ वुडलैंड तथा बर्नाड सिल्‍वर ने मिलकर किया था।  और दोस्तों एक बात हम आपको बताते हैं। तभी के समय में बारकोड रीडर को प्रचारित करने का श्रेय ऐलन हैबर मैन को जाता है। 

फिर उसके बाद भारत में वर्ष 1998 में नेशनल इन्‍फोर्मेशन इं‍डस्ट्रियल वर्क फोर्स के द्वारा सभी प्रोडक्ट मतलब कि सभी उत्पादन ऊपर बारकोड लगाना अनिवार्य कर दिया गया है।

बारकोड रीडर काम कैसे करता है?

किसी भी उत्पात पर जो खड़ी रेखाएं जिसे हम बारकोड कहते हैं। उसे एक लेजर बीम की सहायता से स्कैन  करता है और उस उत्पाद की जो जानकारी है। वह कंप्यूटर तक पहुंचाता है और कंप्यूटर की मदद से हम तक उस जानकारी को पहुंचाया जाता है। और जो कुछ जानकारी हमें मिलती है। वह जानकारी वह उत्पाद बनाने वाली कंपनी उस बारकोड की खड़ी लाइनों के बीच में इस प्रकार लिखती है कि हमें वह पढ़ना नहीं आ सकता उसे बारकोड रीडर की सहायता से ही पढ़ा जा सकता है। अभी तो बारकोड रीडर का प्रयोग बैंक व पोस्‍ट ऑफिस में भी किया जाता है।
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Thursday, July 30, 2020

हिचकी क्यों आती है? इसका कारण । लगातार हिचकी (hiccup) आना

July 30, 2020 0
हिचकी क्यों आती है? इसका कारण । लगातार हिचकी आना

हिचकी 'hiccup' आती क्यों है?। हिचकी क्यों आती है वैज्ञानिक कारण


मुझे hiccup आई और मैंने पूछा दादी!
दादी...! अरे क्या हुआ,
मैं बोला... हिचकी (hiccup)?
दादी बोली.. जरूर कोई याद कर रहा होगा! पक्का कोई गाली दे रहा है तू नाम लेकर देखो अभी ठीक हो जाएगी।

मैं बोला दादी से, रहने दो।
फिर से हिचकी मम्मी!

अब जानते हैं हिचकी (hiccup) क्यों आती है इसका कारण

तो हम सबके साथ यह हिचकी वाला टाइम कई बार आ ही जाता है। जिसमें हमें समझ ही नहीं आता कि हमारे शरीर को हो क्या गया है? और यह अजीब अजीब आवाजें क्यों आ रही है? लेकिन इस हिचकी को ठीक करने से पहले आइए हम यह जान लेते हैं कि यह हिचकी आती क्यों है? और जब हिचकी आती है तो हमारे बॉडी के अंदर क्या हो रहा होता है? क्या?

यह भी जाने-RO का पानी मीठा क्यों लगता है?। आप RO फिल्टर खरीदने की सोच रहे हैं?

हिचकी (hiccup) आने के इस कहानी का मेन हीरो है हमारा अपना डायाफ्राम। हमारे फेफड़ों के नीचे मसल्स से बनी एक प्लेट होती है जिसे हम डायाफ्राम कहते हैं। और यह डायाफ्राम ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने में हमारी मदद करता है। जब भी यह डायाफ्राम कॉन्ट्रैक्ट यानी कसता है तो हमारे फेफड़ों में हवा भर जाती है और जब यह रिलेक्स करता है तो हमारे फेफड़ों से मुंह से सारी हवा बाहर निकल जाती है।

"लगातार हिचकी आना" ऐसे ही कुछ कारणों से होता है। हमारे इस डायाफ्राम को कब मूव करना है और कैसे मूव करना है यह हमारा दिमाग तय करता है और डायफ्राम को मूव करने का आदेश भी हमारा दिमाग ही देता है। तो यह डायफ्राम हमें सांस लेने में मदद करता है? लेकिन यह हिचकी कैसे आती है? देखा गया है कि जब भी हमें हिचकी आती है तो हमारा दिमाग, हमारे डायाफ्राम को एकदम से कसने का सिग्नल देता है जिसके कारण, हमारे गले के अंदर खूब सारी हवा एकदम से चली जाती है तो जब हमारी बॉडी एकदम से खूब सारी हवा अपने अंदर लेने की कोशिश करती है तो हमारी गली में मौजूद वोकल कॉर्ड एकदम से बंद हो जाती है और यह आवाज उन्हीं के बंद होने की आती है।

लेकिन ऐसा क्यों होता है?

[हिचकी] [हिचकी] लेकिन ऐसा क्यों होता है? हमें यह तो पता है कि हिचकी आते समय हमारे अंदर क्या होता है लेकिन हम अभी तक यह नहीं पता लगा पाए है कि यह हिचकी आती क्यों है? और हिचकी आने का कारण अभी तक एक मिस्ट्री एक रहस्य ही है। ज्यादातर समय देखा गया है कि जब हमारे डायाफ्राम के नीचे मौजूद स्टमक किसी भी कारण से स्ट्रेच होता है तो हमें हिचकी आने लगती है

जैसे कि हमारे स्टमक के अंदर खूब सारी हवा चले जाना ज्यादा तेजी से खाना या पीना साथ ही साथ ज्यादा रोने, हंसने, या एक्साइटमेंट की वजह से भी हिचकियां आते हुए देखा गया है। हमारे साथ साथ बहुत से और जानवरों को भी हिचकी आती है और सिर्फ बड़ों को ही नहीं बल्कि पेट के अंदर होने वाले बच्चों को भी हिचकियां आते हुए देखा गया है। वैज्ञानिक अभी भी इस प्रश्न का जवाब खोजने में लगे हुए हैं और अभी तक कुछ थ्योरीस के मुताबिक यही कहा जा रहा है। कि यह 
हिचकी हमें हमारे एवोल्यूशन के द्वारा मिला एक तोहफा हो सकता है।
 जिसका पहले जरूर कोई काम रहा होगा पर अब इंसानों में, शायद इसका कोई फंक्शन नहीं है। कैसा है ना! इंसान ने इतने सारे सवालों के जवाब ढूंढ लिए हैं पर यह छोटी सी हिचकी के पीछे का कारण हम अभी तक नहीं समझ पाए हैं।

जानिए-सर्दी और गर्मी के मौसम में पसीना आना। हमारे शरीर पर पसीना क्यो आता हैं?

हिचकी अपने आप बंद कैसे होती हैं?

की बार खाना खाते वक्त हिचकी (hiccup) आना ऐसे होता है अब हम जानते है। कि हम .. यह, तो है! ओए! हिचकी गई! लेकिन कैसे? ज्यादातर समय बिना कुछ किए ही यह हिचकी चली जाती है लेकिन अगर लंबे समय तक यह हिचकी ठीक ना हो तो लोग इसे ठीक करने के लिए काफी अलग-अलग चीजें ट्राई करते हैं जैसे कि एक साथ खूब सारा पानी पीना अपने सांस को कुछ देर तक रोक के रखना या किसी एक जगह पर ध्यान लगाना पर यह तरीके भी हर किसी के लिए काम नहीं करते वैसे आप क्या कहते हैं जब आपको हिचकी आती है तो?

हिचकी आने के फायदे तो आप जान गए हैं।

अगर आपके पास भी हिचकी को रोकने का कोई ऐसा ही तरीका है तो कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा ताकि आपका आजमाया तरीका कोई अपने बुरे समय में, ट्राई कर सकें। आपको पता ही है, मैं क्या कहने वाला हूं, और आपको पता ही है आपको क्या करना है लेकिन फिर भी तोते की तरह बोलते हुए मैं आपको याद दिला दूंगा कि अगर आपको यह आर्टिकल अच्छा लगा हो तो आप इसे लाइक कर सकते हैं, शेयर कर सकते हैं कॉमेंट्स कर सकते हैं

धन्यवाद...
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RO का पानी मीठा क्यों लगता है?। आप RO फिल्टर खरीदने की सोच रहे हैं?

July 30, 2020 0
RO, TDS, RO- Reverse Osmosis

क्या या आप RO फिल्टर खरीदने की सोच रहे हैं?

 भैया पहले यह आर्टिकल पढ़ लो तो कुछ ही समय पहले न्यूज़ पेपर में एक खबर आई थी, के WHO ने वार्निंग दी है के भैया, RO का पानी आपकी सेहत खराब कर सकता है। अरे! क्या सही है यह बात?

जानिए-सर्दी और गर्मी के मौसम में पसीना आना। हमारे शरीर पर पसीना क्यो आता हैं?

 क्या सही है यह बात?

RO- Reverse Osmosis एक तरीका है पानी को फिल्टर करने का पानी में मौजूद कीटाणुओं और गंदगी को साफ करने का और पीने के पानी को साफ करने के लिए RO फिल्टर आजकल घर-घर में इस्तेमाल हो रहे हैं। RO फिल्टर से पानी पीने वाले लोगों को कहीं और का पानी नहीं जमता क्योंकि RO से निकलने वाला यह पानी, काफी मीठा और टेस्टी लगता है। लेकिन सवाल यह है कि इस मीठे पानी से हमें क्या नुकसान हो सकता है?

आरो के पानी से हमारे शरीर को क्या हानि हो सकती है?
पानी में मौजूद गंदगी को निकालने के साथ-साथ यह RO, पानी में मौजूद मिनरल जो हमारे शरीर के लिए आवश्यक हैं। को भी निकाल देता है, इससे फिल्टर होकर पानी इतना साफ हो जाता है, इसमें मौजूद कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, पोटैशियम जैसे कई सारी जरूरी मिनरल्स साफ हो जाते हैं।

RO का पानी मीठा क्यों लगता है?

और यही एक कारण है कि RO का पानी हमें मीठा लगता है। आपने कभी TDS मीटर का नाम सुना है? पानी में मौजूद मिनरल और बाकी सॉलिड्स को एक TDS मीटर से नापा जाता है। TDS- Total Dissolved Solvent यह TDS मीटर हमें यह बताता है के पानी में कितनी सॉलिड चीजें मौजूद हैं। पीने के पानी का TDS, ना तो बहुत ज्यादा होना चाहिए और ना ही बहुत कम। Bureau of Indian Standards जो भारत में इन सब चीजों का स्टैंडर्ड तय करती हैं उनके मुताबिक पीने के पानी का TDS 500mg/l से कम ही होना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ WHO के मुताबिक अगर आप 100mg/l TDS से कम का पानी पीते हैं तो यह आप को नुकसान पहुंचा सकता है।

 ज्यादातर RO के पानी का TDS कितना होता है?

और आपको पता है कि ज्यादातर RO फिल्टर पानी का TDS 100 से कम ही होता है। हमारे शरीर में होने वाले कई कामों के लिए हमें मिनरल्स की जरूरत होती है। और पानी में मिनरल्स की कमी के कारण। हड्डिया कमजोर होने, ज्यादा थकान महसूस करने, पैदा हुए बच्चों का "कम वजन होने" और "दिल की बीमारियां" जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।

यह किसने प्रमाणित किया?

यह सब मैं अपने मन से नहीं कह रही हूं। WHO यानी World Health Organisation द्वारा रिलीज की गई एक रिपोर्ट में यह सब बताया गया है। लेकिन अगर आप यह रिपोर्ट ना भी देखें, तब भी आप यह सोच सकते हैं।

बिना मिनरल्स के हमारा शरीर कैसे काम करेगा?

 के बिना मिनरल्स के हमारा शरीर कैसे काम करेगा? और मिनरल्स की कमी होने से, दिक्कत तो होगी ही ना? मुझे पता है अब आप क्या सोच रहे हैं पानी से ही थोड़ी ना मिलने मिलते हैं? ज्यादातर मिनरल्स तो खाने से मिलते हैं! हम तो खाने में ले लेंगे। देखा गया है कि कम TDS वाले पानी में, कम सॉलिड्स होने की वजह से बाकी के सॉलिड्स को खींचने की क्षमता ज्यादा होती है। इसीलिए जब यह पानी शरीर में ज्यादा है तो शरीर में मौजूद मिनरल भी खींच लेता है और यूरिन के द्वारा बाहर फेंक देता है

WHO इस रिपोर्ट में इंसानों और जानवरों पर किए गए प्रयोगों द्वारा यह पता लगाया गया है 100 या उससे कम TDS वाले पानी को पीने से ज्यादा प्यास लगती है, ज्यादा यूरिन आता है और इसी वजह से ज्यादा से ज्यादा मिनरल्स, शरीर से बाहर निकल जाते हैं। मतलब पानी पीके तो मिनिरल मिले नहीं हमारे शरीर में जो मिनरल मौजूद थे, वह भी बाहर निकल गए। इतना ही नहीं यह भी देखा गया है कि अगर आप कम TDS वाले पानी से, यह जो कम मिनरल वाला पानी है इससे खाना पकाते हैं खाने में डालते हैं तो यह खाने में मौजूद मिनरल की मात्रा को भी कम कर देता। मतलब RO ने तो मचा रखी है!

जानिए-सर्दी और गर्मी के मौसम में पसीना आना। हमारे शरीर पर पसीना क्यो आता हैं?

 वैसे ही आज कल के डायट में मिनरल की मात्रा कितनी कम होती है, ऊपर से अगर पानी से भी निकल जाए, खाना बनाते समय खाने से भी कम हो जाए तो क्या ही करना है? तो यह बात बिल्कुल सच है की "WHO 100mg/l से कम TDS के पानी को पीने की सलाह बिल्कुल नहीं देता है।" और अगर आप इस परेशानी को सुझाना चाहते हैं।

RO के पानी का TDS कितना होना चाहिए?

 तो आप अपने RO फिल्टर का TDS एडजस्ट भी करवा सकते हैं जोकि 500 से कम, और 100 से ज्यादा होना चाहिए। साथ ही साथ, कई लोग अपने RO फिल्टर में remineralize वाला सिस्टम लगवा लेते हैं। जिससे जो मिनरल्स है, जरूरी मिनरल्स है, वह ऊपर से ऐड किए जाते हैं। लेकिन इस बात का कोई सबूत मौजूद नहीं है की इससे हमारी अंधेर जो मिनरल की कमी है, उसकी पूर्ति होगी या नहीं।

पानी को साफ करने का बेहतरीन तरीका क्या है?

आपको पता है कि पानी को साफ करने का बेहतरीन तरीका क्या है? उसको उबालकर पीना। क्योंकि जब आप पानी को उबाल ते हैं, तो उसमें मौजूद कीटाणु और गंदगी अपने आप ही साफ हो जाती हैं। RO का पानी पीने में तो अच्छा लगता है, लेकिन इसे पीने के बाद हमारा शरीर, बिल्कुल भी अच्छा महसूस नहीं करता।

इन सभी बातों का हजारों साल पहले किस किताब में उल्लेख किया है?

आपको पता है कि जब मैं WHO की यह रिपोर्ट पढ़ रही थी उसने उन्होंने "ऋग्वेद" का जिक्र किया हुआ था। मतलब, मॉडर्न साइंस भी यह जो हजारों साल पुरानी किताब, हमारी ऋग्वेद है, जिसमें इन सब चीजों के बारे में लिखा हुआ है उसको भी वह लोग एक स्टैंडर्ड की तरह लेकर चलते हैं। तो ऋग्वेद में यह लिखा गया है, के पानी साफ होने के साथ-साथ, उसमें प्राकृतिक पोषक तत्व है, मिनरल्स है वह मौजूद होनी चाहिए, सॉल्टस मौजूद होनी चाहिए और अगर आप दिखे तो पुराने समय में हम पानी को कैसे साफ करते थे, लोग पानी को उबालकर पीते थे, या तो तांबे के बर्तन में पीते थे या घड़े में पीते थे और कुछ ना कुछ विज्ञान जरूर होगी इनके पीछे भी।

तो अगर आप चाहते हैं कि मैं इस प्रश्न का भी जवाब ढूंढो के पानी को कैसे पीना चाहिए, उसको साफ कैसे करना चाहिए क्या बेस्ट तरीका है पानी पीने का, उसको साफ करने का मुझे कमेंट करके जरूर करेंगा, धन्यवाद...
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Wednesday, July 29, 2020

सर्दी के मौसम में पसीना आना। हमारे शरीर पर पसीना क्यो आता हैं?

July 29, 2020 0
Why do you sweat?

हम चाहे काम करें या ना करे। या बुखार में तड़पे मसालेदार खाना खाए। या स्टेज में पहली बार गाना गाए। एक चीज तो निकल ही आती है अरे भैया, पसीना! कभी-कबार तो हमे सर्दी के मौसम में पसीना आता है। तो जानते हैं क्या है इसकी वजह..

लेकिन क्यों पसीना आता है?

हम सब को पसीना आता है। तो जाहिर सी बात है इसके पीछे भी कोई कारण होगा। क्योंकि हमें पता है हमारा शरीर ऐसे ही कुछ नहीं करता। और हर चीज के पीछे का अपना एक कारण जरूर होता है। हमें बहुत सारी अलग-अलग परिस्थितियों में पसीना आ सकता है। लेकिन एक समय जब हमारा शरीर सबसे ज्यादा पसीना छोड़ता है वह है एक्सरसाइज का समय! लेकिन क्या होता है एक्सरसाइज करते समय जो हमें इतना पसीना आता है?

क्या होता है एक्सरसाइज करते समय?

तो होता क्या है कि जब भी हम एक्सरसाइज करते हैं। और जैसे-जैसे हम अपनी तेजी बढ़ाते हैं हमारी मसल्स को ज्यादा काम करना पड़ता है। जिसकी वजह से उन्हें ज्यादा एजेंसी की जरूरत पड़ती है एनर्जी को पूरा करने के लिए हमारे शरीर में कुछ केमिकल रिएक्शंस तेजी से होने लगती है जिसके कारण हमारे शरीर के अंदर काफी सारे हिट या गर्मी पैदा हो जाती है। ज्यादा गर्मी हमारे शरीर के लिए अच्छी नहीं है इसीलिए इस गर्मी को कम करने के लिए, हमारे बॉडी को ठंडा करने के लिए हमारा यह शरीर पसीना छोड़ता है। तो इसका मतलब हमारा बॉडी खुद को ठंडा करने के लिए पसीना छोड़ती है।

 लेकिन कैसे शरीर को ठंडा करता है?

 हमारी त्वचा के नीचे पसीना छोड़ने वाले स्वेट ग्लैंड (Sweat Glands) हमेशा मौजूद होते हैं। और जब भी हमारे शरीर में गर्मी बढ़ती है तो हमारे दिमाग में मौजूद Hypothalamus जो हमारे पूरे शरीर की टेंपरेचर को रेगुलेट करता है। स्वेट गलैंड्स को आदेश देता है कि बच्चों… हाइपोथैलेमस के सिग्नल के बाद यह स्वेट गलैंड्स (Sweat Glands) हमारी त्वचा में पसीने की बूंदे छोड़ते है। इन बूंदों के सूखते सूखते वाष्पीकरण के मदद से हमारा शरीर ठंडा होने लगता है। हमारे शरीर में करीब 30 लाख से भी ज्यादा स्वेट गलैंड्स मौजूद होते हैं। और यह हमारे पूरे शरीर में फैले हुए हैं। इन स्वेट ग्लैंड की मात्रा हमारे हथेलियों, पैरों के नीचे और सर पे सबसे ज्यादा होती है। और इसीलिए हमें इन जगहों पर सबसे ज्यादा पसीना आता है। 

हमें कब-कब पसीना ज्यादा आता है?

हमें पसीना बस एक्सरसाइज करते हुए ही नहीं बल्कि मिर्ची वाला खाना खा के या कोई इंटरव्यू देके जिसमें हम बहुत नर्वस हो तभी आता है। क्योंकि देखा गया है कि इन परिस्थितियों में भी हमारे बॉडी का टेंपरेचर बढ़ता है। और अगर गर्मी बढ़ेगी तो ठंडा तो करना ही पड़ेगा। हमारे लिए यह पसीना कितना जरूरी है यह हमें तब समझ आएगा जब हमें किसी दिन यह पसीना आना बंद हो जाए और ऐसा होता भी है, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं।

 जिनकी स्वेट गलैंड्स सही से काम नहीं करते हैं और उन्हें सही मात्रा में पसीना नहीं आता। इस कंडीशन को Anhidrosis कहते हैं। और ऐसे लोग ज्यादा एक्सरसाइज करना या ज्यादा गर्मी में रहना सहन नहीं कर सकते हैं। क्योंकि उनकी बॉडी खुद को ठंडा नहीं कर पाती ज्यादा गर्म होने की वजह से उन्हें हीट स्ट्रोक आ सकता है। जिसके कारण उनकी जान जाने तक का भी खतरा रहता है।

तो अब आपको समझ आ ही गया होगा कि पसीना आना हमारे लिए कितना जरूरी है वैसे आप देख ही रहे होंगे कि हमारे शरीर के पास हर बात का सलूशन है।
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Thursday, June 11, 2020

उपवास में किन किन खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाना उचित है? । The fast

June 11, 2020 0
उपवास एक ऐसा समय होता है जब आपको अपने आप को पोषण की जांच में भी रखने की आवश्यकता होती है।  सुनिश्चित करें कि आप अपने दैनिक पोषक तत्वों को विभिन्न स्रोतों से प्राप्त कर रहे हैं

उपवास किस आधार पर है?

उपवास, विशेष रूप से धार्मिक उद्देश्यों के लिए, सदियों से एक सामान्य घटना रही है। और आम तौर पर, पूरे मानव इतिहास में, व्रत तोड़ने के तरीके के बारे में ज्यादा चिंता नहीं की गई।

हालांकि, खराब आहार सलाह के युग में, जब हमें पूरे दिन खाने के लिए कहा जाता है -  उच्च भोजन का उल्लंघन होता है - यह खाने को फिर से शुरू करने के लिए थोड़ी अधिक योजना बना सकता है जो सबसे अधिक शारीरिक आराम और आराम को प्राप्त करता है आपके दीर्घकालिक स्वास्थ्य और वजन घटाने के लक्ष्यों के लिए सबसे प्रभावी परिणाम।

उपवास करने वाले सभी लोग अपनी आध्यात्मिकता के साथ प्रार्थना, ध्यान और फिर बहुत उत्साह और श्रद्धालु मंदिरों में प्रार्थना करने और दिव्य आशीर्वाद लेने के लिये जाते हैं।

खानपान

उपवास नियमों से लोग कई तरह के फल और सब्जियां खा सकते हैं। अनाज से परहेज किया जाता है।  किसी भी लहसुन या प्याज के बिना कड़ाई से शाकाहारी भोजन तैयार किया जाता है और लोग मादक पेय से साफ होते हैं।  हालांकि, उपवास का मतलब यह नहीं है कि आपको हर दिन एक ही भोजन खाना होगा।  हर दिन कुट्टू-की-पूड़ी, आलू सब्जी और साबूदाना खिचड़ी से चिपके रहने की जरूरत नहीं है।  यहां उन सभी खाद्य पदार्थों की याद दिलाई जाती है, जिन्हें आप उपवास के दौरान भी खा सकते हैं।

१. दूध और दुग्ध उत्पाद

दूध और दूध से बने कई पदाथों का प्रयोग कर सकते हैं।  स्ट्रॉबेरी, खरबूजे और केले जैसे फलों से बने मिल्कशेक आपको हाइड्रेट रखते हुए भर सकते हैं।  शाम के नाश्ते के लिए दही को बेस के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।  कुछ चम्मच गढ़ा दही का प्रयोग करें और उसमें कटे हुए फल जैसे सेब, नाशपाती और अंगूर डालें।  इसमें एक चम्मच शहद मिलाएं और आपकी कटोरी भर कर खा सकते है।

२. नारियल और नारियल का दूध तैयार करना

नारियल के फ्लेक्स, नारियल का आटा और नारियल का दूध आपके उपवास की दिनचर्या के माध्यम से अच्छे साथी हो सकते हैं।  एक बहुमुखी फल होने के नाते, नारियल का उपयोग विभिन्न व्यंजनों, विशेष रूप से डेसर्ट बनाने में किया जा सकता है।  नारियल के आटे का उपयोग करके नारियल की खीर या क्रेप्स और पेनकेक्स बनाएं।  अपने पकवान को स्वादिष्ट करने के लिए शहद और ताजे फलों साथ में लेलीजिये

३. कच्चा केला

भोजन के लिए कच्चे केले के साथ एक सब्ज़ी बनाएं।  फ्राई और कच्चे केले के कटलेट भी ट्राई करने का एक अच्छा विकल्प है।  कटलेट बनाने के लिए अरबी, शकरकंदी, कद्दू और कटहल का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

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